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कविताएँ

फ्रांस में रोशनी

पृथ्वी चक्कर काटती हुई
अपने अंधेरे कोनों में रोशनी बिखेर देने को
हर रोज सूरज से रू-ब-रू होती है
यह सतत चलता रहता है
जब तक पृथ्वी चलती रहेगी
अंधेरा टिका न रह सकेगा
इसलिए अंधेरे से लड़ने वालो
तुम पृथ्वी बनो
और चलते रहो
वह अंधेरा फैलाने का आदि है
और तुम उजाले के संगी
लगातार लड़ते हो अंधेरे से
और जब मैंने पिछली सुबह सुनी थी
फ्रांस में रोशनी की खबर
मेरा मन फ्रांस होने को करता है
क्योंकि अभी फ्रांस होना
अपने हक के खातिर लड़ना है
                                               ---12/06/2016

जीवन हँस उठेगा

मैं कवि नहीं
न कोई गायक हूँ
न नायक हूँ
और ना ही खलनायक हूँ
यह मेरा समय है!
इसे अर्थ देने वाला
अपने साहस से
मैं अर्थदायक हूँ!
न मैं समय के साथ हूँ
न समय के विरुद्ध
जो हूँ, वही हूँ
समय को करीब से देखता हूँ
ध्वनियों के कोलाहल में
सम-विषम ध्वनियों को
अलगाता हूँ
बस उसके नजदीक जाता हूँ
उनके रेशों को जो उलझे हैं
सुलझाता हूँ
फिर लौट आता हूँ
और पाता हूँ कि
‘क’ जो केवल ध्वनि था
उसके कईं मायने हैं
कितना लचीलापन है
इसके अर्थ में
जिससे टकराता है
वही, बस वहीं अर्थ दे जाता है,
इसलिए
जो अर्थ है
जो रूढ़ है,
जो दृढ़ है,
उन्हें खारिज करता हूँ
तो पाता हूँ
यह जीवन एक महान संगीत बन गया!!
जिसे गाया गया
युगों-युगों तक
और
ईश्वर अस्तित्व में आया
इसलिए इसे खारिज करना पुनः
इनसान को स्थापित करना है
लेकिन
अब ऐसा करना
मुमकिन नहीं हो पा रहा है
तब भी जो
समय की ध्वनियों को सुन सकता है
वह पूरी ऊर्जा लगा देता है
इसके विरुद्ध
लेकिन मैं कहता हूँ
अब हमारी लड़ाई ईश्वर से नहीं
क्योंकि जो है ही नहीं
उससे लड़ना उसके अस्तित्व को अंशतः स्वीकारना है
यही वजह है कि
इसका इस्तेमाल करने वाले
मठाधीशों से सवाल पूछा जाए
तमाम ग्रंथों के बावजूद वे ईश्वर की उपस्थिति
साबित नहीं कर सकते
इसलिए,
इनका कपोलकल्पित मठ उजाड़ हो
जीवन हँस उठेगा
                                                              --28/06/2016

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