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कविताएँ

अब मैं बाहर

अब मैं बाहर आ चुका हूँ
‘स्व’ की छोटी कोठी से
कहना जितना आसान है
करना उतना ही मुश्किल
लाख उपाय कर आया हूँ
मैं हूँ अपनी ही कोठी में
बड़े-बड़े ‘वादे’ गढ़ता हूँ
पानी के उपर चलता हूँ
अपनी झोली को भरता हूँ
नये युग का क्रांतिकारी हूँ
सीमाओं में बंध सोचता हूँ
अपने समय का मुहावर हूँ
अपने को खुद से रचता हूँ
शब्द-अर्थ सब अपने है
पूरा अनुच्छेद अपना है
चाहूँ जो जामा पहनाऊँ
चाहूँ तो उल्टा लटका दूँ
हमें पड़ी किस जनता की है
अपना काम बनता ही है

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कविता

होली अपनी होली है  होली अपनी होली है कोई खेले मेल मिलावन को कोई खेले मैल छुडावन को कोई खेले रंग बुझावन को कोई खेले भंग चढ़ावन को कोई खेले मन रंगावन  को कोई खेले रंग रंग जवान को 

मृत्यु

पेड़-पौधे, फूल-फल, पहाड़, नदी, तालाब, खेत-खलिहान और बादल, आकाश, मौसम जब तक धरती से जुडे़ रहेंगे धरती बची रहेगी! धरती ही क्यों? पूरे ब्रह्माण्ड का अस्तित्व ही तब तक है जब तक द्वन्द्व है! जो कहते हैं: द्वन्द्व नहीं उनके भीतर शान्त है वह सबसे बड़ा झूठ है यह क्योंकि द्वन्द्व के बिना संभव नहीं है ‘प्रगति’ शान्ति संभव नहीं इस धरती पर ब्रह्माण्ड में भी, हर क्षण टूट रहा है कुछ-न-कुछ हर क्षण बन रहा है कुछ-न-कुछ इसी को नया-पुराना कहते हैं सब समय से टकराने वाले द्वन्द्व के करीब पहुँचे हम, जहाँ द्वन्द्व नहीं मृत्यु कहते हैं उसे सब!!!                                                                02-09-2016