अब मैं बाहर
अब मैं बाहर आ चुका हूँ
‘स्व’ की छोटी कोठी से
कहना जितना आसान है
करना उतना ही मुश्किल
लाख उपाय कर आया हूँ
मैं हूँ अपनी ही कोठी में
बड़े-बड़े ‘वादे’ गढ़ता हूँ
पानी के उपर चलता हूँ
अपनी झोली को भरता हूँ
नये युग का क्रांतिकारी हूँ
सीमाओं में बंध सोचता हूँ
अपने समय का मुहावर हूँ
अपने को खुद से रचता हूँ
शब्द-अर्थ सब अपने है
पूरा अनुच्छेद अपना है
चाहूँ जो जामा पहनाऊँ
चाहूँ तो उल्टा लटका दूँ
हमें पड़ी किस जनता की है
अपना काम बनता ही है
अब मैं बाहर आ चुका हूँ
‘स्व’ की छोटी कोठी से
कहना जितना आसान है
करना उतना ही मुश्किल
लाख उपाय कर आया हूँ
मैं हूँ अपनी ही कोठी में
बड़े-बड़े ‘वादे’ गढ़ता हूँ
पानी के उपर चलता हूँ
अपनी झोली को भरता हूँ
नये युग का क्रांतिकारी हूँ
सीमाओं में बंध सोचता हूँ
अपने समय का मुहावर हूँ
अपने को खुद से रचता हूँ
शब्द-अर्थ सब अपने है
पूरा अनुच्छेद अपना है
चाहूँ जो जामा पहनाऊँ
चाहूँ तो उल्टा लटका दूँ
हमें पड़ी किस जनता की है
अपना काम बनता ही है
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