युग से पाता हूँ
मेरे भीतर है जो कुछ भी
तू उसी को शब्द देता है,
मैंने उसे जितना जीया है,
क्या तू उससे अधिक जीता है,
तुम जो कहते हो;
तुम्हारा जितना, उतना मेरा होता है,
मैं ठिठक कर सोचता हूं,
ओ कल्पना के जादूगर!!
तू कैसे गोते लगाता है?
फूलों से बुनता है भावों को
दरकती धरती सी हृदय के रेख को
किसी धुन में संजोता है,
मेरे भीतर के सावन को
पतझर से मिलाता है,
जीवित होता हूँ तेरे शब्दों में
क्षण से युग को पाता हूँ
हम
रंगमंच सी दुनिया में
अपनी वाजीब भूमिका की तलाश की जगह
हम सिर्फ और सिर्फ
वो क्षण ढूँढ़ रहे हैं
जो तन को झुमा सके
हम धारा को दिशा देने के बजाय
धारा में बह रहे हैं
सबसे बड़ी बात तो ये कि
हर दिन को देह के जश्न में बदल रहे हैं
अपने मन को भूल कर..........
पृथ्वी के चलने से
अस्त होते सूर्य को देख
मैं दुखी नहीं होता
क्योंकि,
अस्त नहीं होता है सूर्य
पृथ्वी घूमती है
अंधेरे-उजाले सूरज के आने जाने से नहीं
पृथ्वी के चलते रहने से होती हैं
मेरे दोस्त
चलते रहने से ही
अंधेरे के बाद आते हैं उजाले
मेरे भीतर है जो कुछ भी
तू उसी को शब्द देता है,
मैंने उसे जितना जीया है,
क्या तू उससे अधिक जीता है,
तुम जो कहते हो;
तुम्हारा जितना, उतना मेरा होता है,
मैं ठिठक कर सोचता हूं,
ओ कल्पना के जादूगर!!
तू कैसे गोते लगाता है?
फूलों से बुनता है भावों को
दरकती धरती सी हृदय के रेख को
किसी धुन में संजोता है,
मेरे भीतर के सावन को
पतझर से मिलाता है,
जीवित होता हूँ तेरे शब्दों में
क्षण से युग को पाता हूँ
हम
रंगमंच सी दुनिया में
अपनी वाजीब भूमिका की तलाश की जगह
हम सिर्फ और सिर्फ
वो क्षण ढूँढ़ रहे हैं
जो तन को झुमा सके
हम धारा को दिशा देने के बजाय
धारा में बह रहे हैं
सबसे बड़ी बात तो ये कि
हर दिन को देह के जश्न में बदल रहे हैं
अपने मन को भूल कर..........
पृथ्वी के चलने से
अस्त होते सूर्य को देख
मैं दुखी नहीं होता
क्योंकि,
अस्त नहीं होता है सूर्य
पृथ्वी घूमती है
अंधेरे-उजाले सूरज के आने जाने से नहीं
पृथ्वी के चलते रहने से होती हैं
मेरे दोस्त
चलते रहने से ही
अंधेरे के बाद आते हैं उजाले
“kgjh ?kksM+k
मैं कल से ही सोच रहा था कि
न जाऊँ शहर
लेकिन,
मेरी लाख कोशिशों के बावजूद भी
मुझे आना पड़ा था.....
और मेरा आना खाली हाथ नहीं हुआ
मैं फाँस ही गया शहरी घोड़ की चाल में
किसी तरह निकल कर घर पहुँचा
तो पाया कि
मेरे पहुँचने से पहले ही
शहरी घोड़ मेरे घर पर
मेरा इंतजार कर रहा है
मैं चकित हूँ
मेरी पत्नी
उस अंजान का
इस तरह कर रही है आवभगत कि
मुझे नहीं लग रहा
अब ओ मेरा घर छोड़ कर जायेगा
मैंने अपनी पत्नी को मनाने की
असफल कोशिश की
थक-हार कर सो गया
सुबह जागा तो पाया कि
पूरा गाँव उस शहरी घोड़ की चाल में फँसता चला जा रहा है
अब मुझे लगने लगा कि
सचमुच शहरी घोड़ के जाल में एक बार फँसने के बाद
निकलना मुश्किल है
न जाऊँ शहर
लेकिन,
मेरी लाख कोशिशों के बावजूद भी
मुझे आना पड़ा था.....
और मेरा आना खाली हाथ नहीं हुआ
मैं फाँस ही गया शहरी घोड़ की चाल में
किसी तरह निकल कर घर पहुँचा
तो पाया कि
मेरे पहुँचने से पहले ही
शहरी घोड़ मेरे घर पर
मेरा इंतजार कर रहा है
मैं चकित हूँ
मेरी पत्नी
उस अंजान का
इस तरह कर रही है आवभगत कि
मुझे नहीं लग रहा
अब ओ मेरा घर छोड़ कर जायेगा
मैंने अपनी पत्नी को मनाने की
असफल कोशिश की
थक-हार कर सो गया
सुबह जागा तो पाया कि
पूरा गाँव उस शहरी घोड़ की चाल में फँसता चला जा रहा है
अब मुझे लगने लगा कि
सचमुच शहरी घोड़ के जाल में एक बार फँसने के बाद
निकलना मुश्किल है
uUgh ijh! vks uUgh ijh!
नन्ही परी! ओ नन्ही परी!
तुम उड़ना उस आकाश में,
जहाँ भोर की धूप हो,
खिले बहुत से फूल हो,
मुस्काए रंग-बिरंगी तितली
खरगोश हिरन की दौड़ हो,
नन्ही परी! ओ नन्ही परी!
तुम जाना उस आकाश में,
जहाँ झरते निर्मल निर्झर हो,
जहाँ पंछी आकर बात करें
नन्ही परी! ओ नन्ही परी!
तेरा ऐसा संसार हो,
जहाँ माँ-बाबू तुमपे
ढेर सारा बरसाये प्यार हो!
तुम उड़ना उस आकाश में,
जहाँ भोर की धूप हो,
खिले बहुत से फूल हो,
मुस्काए रंग-बिरंगी तितली
खरगोश हिरन की दौड़ हो,
नन्ही परी! ओ नन्ही परी!
तुम जाना उस आकाश में,
जहाँ झरते निर्मल निर्झर हो,
जहाँ पंछी आकर बात करें
नन्ही परी! ओ नन्ही परी!
तेरा ऐसा संसार हो,
जहाँ माँ-बाबू तुमपे
ढेर सारा बरसाये प्यार हो!
eyky ugha !!
कैसे कह दूँ कि
मैं उनसे अलग हूँ!
मेरा होना मेरे बुजुर्गों से है
मैं यहाँ आता ही कैसे
मैं बोल भी पाता कि नहीं
यदि वे न होते,
फिर मैं कैसे मान लूँ अलग उनसे
खुद को....
मेरे जो ख्वाब पलते हैं
वे सिर्फ मेरे हैं
ये कैसे स्वीकार कर लूँ
जो मैं बनाता हूं
मेरी ही रचना है कैसे समझूँ
ये तो मेरे युग ने रचा है
मेरे भीतर.....
ये मौसम जो गुलजार है
मुझे कितनी मिलती है
ये खुश होना मेरा अपना नहीं
इस समूह का है
मेरी माटी मुझे प्यार ही सिखाती है
तो मेरा क्या कसूर है?
मैं हर रूप में नया लाना चाहता हूं
मुझसे नया नहीं होता तो
मैं क्या करूं?
मैं आदि से अंत तक वही रहूँगा
सिर्फ थोड़ा सा ढंग बदलेगा
इसमें कुछ जोड सकूँ
इसकी मुझे आस है.....
मैं उनसे अलग हूँ!
मेरा होना मेरे बुजुर्गों से है
मैं यहाँ आता ही कैसे
मैं बोल भी पाता कि नहीं
यदि वे न होते,
फिर मैं कैसे मान लूँ अलग उनसे
खुद को....
मेरे जो ख्वाब पलते हैं
वे सिर्फ मेरे हैं
ये कैसे स्वीकार कर लूँ
जो मैं बनाता हूं
मेरी ही रचना है कैसे समझूँ
ये तो मेरे युग ने रचा है
मेरे भीतर.....
ये मौसम जो गुलजार है
मुझे कितनी मिलती है
ये खुश होना मेरा अपना नहीं
इस समूह का है
मेरी माटी मुझे प्यार ही सिखाती है
तो मेरा क्या कसूर है?
मैं हर रूप में नया लाना चाहता हूं
मुझसे नया नहीं होता तो
मैं क्या करूं?
मैं आदि से अंत तक वही रहूँगा
सिर्फ थोड़ा सा ढंग बदलेगा
इसमें कुछ जोड सकूँ
इसकी मुझे आस है.....
Comments
Post a Comment