Skip to main content

कविताएँ

युग से पाता हूँ

मेरे भीतर है जो कुछ भी
तू उसी को शब्द देता है,
मैंने उसे जितना जीया है,
क्या तू उससे अधिक जीता है,
तुम जो कहते हो;
तुम्हारा जितना, उतना मेरा होता है,
मैं ठिठक कर सोचता हूं,
ओ कल्पना के जादूगर!!
तू कैसे गोते लगाता है?
फूलों से बुनता है भावों को
दरकती धरती सी हृदय के रेख को
किसी धुन में संजोता है,
मेरे भीतर के सावन को
पतझर से मिलाता है,
जीवित होता हूँ तेरे शब्दों  में
क्षण से युग को पाता हूँ



हम

रंगमंच सी दुनिया में
अपनी वाजीब भूमिका की तलाश की जगह
हम सिर्फ और सिर्फ
वो क्षण ढूँढ़ रहे हैं
जो तन को झुमा सके
हम धारा को दिशा देने के बजाय
धारा में बह रहे हैं
सबसे बड़ी बात तो ये कि
हर दिन को देह के जश्न में बदल रहे हैं
अपने मन को भूल कर..........

पृथ्वी के चलने से

अस्त होते सूर्य को देख
मैं दुखी नहीं होता

क्योंकि,
अस्त नहीं होता है सूर्य
पृथ्वी घूमती है
अंधेरे-उजाले सूरज के आने जाने से नहीं
पृथ्वी के चलते रहने से होती हैं

मेरे दोस्त
चलते रहने से ही
अंधेरे के बाद आते हैं उजाले


kgjh ?kksM+k

मैं कल से ही सोच रहा था कि
न जाऊँ शहर
लेकिन,
मेरी लाख कोशिशों के बावजूद भी
मुझे आना पड़ा था.....
और मेरा आना खाली हाथ नहीं हुआ
मैं फाँस ही गया शहरी घोड़ की चाल में
किसी तरह निकल कर घर पहुँचा
तो पाया कि
मेरे पहुँचने से पहले ही
शहरी घोड़ मेरे घर पर
मेरा इंतजार कर रहा है
मैं चकित हूँ
मेरी पत्नी
उस अंजान का
इस तरह कर रही है आवभगत कि
मुझे नहीं लग रहा
अब ओ मेरा घर छोड़ कर जायेगा
मैंने अपनी पत्नी को मनाने की
असफल कोशिश की
थक-हार कर सो गया
सुबह जागा तो पाया कि
पूरा गाँव उस शहरी घोड़ की चाल में फँसता चला जा रहा है
अब मुझे लगने लगा कि
सचमुच शहरी घोड़ के जाल में एक बार फँसने के बाद

निकलना मुश्किल है


uUgh ijh! vks uUgh ijh!


नन्ही परी! ओ नन्ही परी!
तुम उड़ना उस आकाश में,
जहाँ भोर की धूप हो,
खिले बहुत से फूल हो,
मुस्काए रंग-बिरंगी तितली
खरगोश हिरन की दौड़ हो,

नन्ही परी! ओ नन्ही परी!
तुम जाना उस आकाश में,
जहाँ झरते निर्मल निर्झर हो,
जहाँ पंछी आकर बात करें

नन्ही परी! ओ नन्ही परी!
तेरा ऐसा संसार हो,

जहाँ माँ-बाबू  तुमपे 
ढेर सारा बरसाये प्यार हो!



eyky ugha !!

कैसे कह दूँ कि
मैं उनसे अलग हूँ!
मेरा होना मेरे बुजुर्गों से है
मैं यहाँ आता ही कैसे
मैं बोल भी पाता कि नहीं
यदि वे न होते,
फिर मैं कैसे मान लूँ अलग उनसे
खुद को....
मेरे जो ख्वाब पलते हैं
वे सिर्फ मेरे हैं
ये कैसे स्वीकार कर लूँ
जो मैं बनाता हूं
मेरी ही रचना है कैसे समझूँ 
ये तो मेरे युग ने रचा है

मेरे भीतर.....
ये मौसम जो गुलजार है
मुझे कितनी मिलती है
ये खुश होना मेरा अपना नहीं
इस समूह का है
मेरी माटी मुझे प्यार ही सिखाती है
तो मेरा क्या कसूर है?

मैं हर रूप में नया लाना चाहता हूं
मुझसे नया नहीं होता तो
मैं क्या करूं?
मैं आदि से अंत तक वही रहूँगा 
सिर्फ थोड़ा सा ढंग बदलेगा
इसमें कुछ जोड सकूँ 
इसकी मुझे आस है.....





Comments

Popular posts from this blog

कविता

होली अपनी होली है  होली अपनी होली है कोई खेले मेल मिलावन को कोई खेले मैल छुडावन को कोई खेले रंग बुझावन को कोई खेले भंग चढ़ावन को कोई खेले मन रंगावन  को कोई खेले रंग रंग जवान को 

कविताएँ

अब मैं बाहर अब मैं बाहर आ चुका हूँ ‘स्व’ की छोटी कोठी से कहना जितना आसान है करना उतना ही मुश्किल लाख उपाय कर आया हूँ मैं हूँ अपनी ही कोठी में बड़े-बड़े ‘वादे’ गढ़ता हूँ पानी के उपर चलता हूँ अपनी झोली को भरता हूँ नये युग का क्रांतिकारी हूँ सीमाओं में बंध सोचता हूँ अपने समय का मुहावर हूँ अपने को खुद से रचता हूँ शब्द-अर्थ सब अपने है पूरा अनुच्छेद अपना है चाहूँ जो जामा पहनाऊँ चाहूँ तो उल्टा लटका दूँ हमें पड़ी किस जनता की है अपना काम बनता ही है

मृत्यु

पेड़-पौधे, फूल-फल, पहाड़, नदी, तालाब, खेत-खलिहान और बादल, आकाश, मौसम जब तक धरती से जुडे़ रहेंगे धरती बची रहेगी! धरती ही क्यों? पूरे ब्रह्माण्ड का अस्तित्व ही तब तक है जब तक द्वन्द्व है! जो कहते हैं: द्वन्द्व नहीं उनके भीतर शान्त है वह सबसे बड़ा झूठ है यह क्योंकि द्वन्द्व के बिना संभव नहीं है ‘प्रगति’ शान्ति संभव नहीं इस धरती पर ब्रह्माण्ड में भी, हर क्षण टूट रहा है कुछ-न-कुछ हर क्षण बन रहा है कुछ-न-कुछ इसी को नया-पुराना कहते हैं सब समय से टकराने वाले द्वन्द्व के करीब पहुँचे हम, जहाँ द्वन्द्व नहीं मृत्यु कहते हैं उसे सब!!!                                                                02-09-2016