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Showing posts from 2013

कविताएँ

अब मैं बाहर अब मैं बाहर आ चुका हूँ ‘स्व’ की छोटी कोठी से कहना जितना आसान है करना उतना ही मुश्किल लाख उपाय कर आया हूँ मैं हूँ अपनी ही कोठी में बड़े-बड़े ‘वादे’ गढ़ता हूँ पानी के उपर चलता हूँ अपनी झोली को भरता हूँ नये युग का क्रांतिकारी हूँ सीमाओं में बंध सोचता हूँ अपने समय का मुहावर हूँ अपने को खुद से रचता हूँ शब्द-अर्थ सब अपने है पूरा अनुच्छेद अपना है चाहूँ जो जामा पहनाऊँ चाहूँ तो उल्टा लटका दूँ हमें पड़ी किस जनता की है अपना काम बनता ही है

कविताएँ

युग से पाता हूँ मेरे भीतर है जो कुछ भी तू उसी को शब्द   देता है, मैंने उसे जितना जीया है, क्या तू उससे अधिक जीता है, तुम जो कहते हो; तुम्हारा जितना, उतना मेरा होता है, मैं ठिठक कर सोचता हूं, ओ कल्पना के जादूगर!! तू कैसे गोते लगाता है? फूलों से बुनता है भावों को दरकती धरती सी हृदय के रेख को किसी धुन में संजोता है, मेरे भीतर के सावन को पतझर से मिलाता है, जीवित होता हूँ तेरे शब्दों  में क्षण से युग को पाता हूँ हम रंगमंच सी दुनिया में अपनी वाजीब भूमिका की तलाश की जगह हम सिर्फ और सिर्फ वो क्षण ढूँढ़ रहे हैं जो तन को झुमा सके हम धारा को दिशा देने के बजाय धारा में बह रहे हैं सबसे बड़ी बात तो ये कि हर दिन को देह के जश्न में बदल रहे हैं अपने मन को भूल कर.......... पृथ्वी के चलने से अस्त होते सूर्य को देख मैं दुखी नहीं होता क्योंकि, अस्त नहीं होता है सूर्य पृथ्वी घूमती है अंधेरे-उजाले सूरज के आने जाने से नहीं पृथ्वी के चलते रहने से होती हैं मेरे दोस्त चलते रहने से ही अंधेरे के बाद आते हैं उजाले “ kgjh ?kksM+k मैं कल ...